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जनसत्ता 4 अक्तूबर, 2014: कुछ विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक सरकार बनने के कुछ हफ्ते बाद ही मंत्रियों का एक छोटा-सा दल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने गया। मंत्रियों ने उनसे फरियाद की कि हम महंगाई के मुद्दे पर चुनाव जीत कर आए हैं। लेकिन यह कम नहीं हो रही। लोगों को जवाब देना मुश्किल हो रहा है। मोदीजी मंत्रियों की बात गौर से सुनते रहे। फिर बोले- ‘देखिए महंगाई तो जो बढ़नी थी, बढ़ गई। आप जानते हैं कि यह आगे और बढ़ सकती है। यह विश्व आर्थिक व्यवस्था से जुड़ी चीज है।’ मंत्रियों ने आश्चर्य से पूछा कि फिर हम जनता को क्या मुंह दिखाएं। यही सारी दलील तो पिछली सरकार भी देती आई थी! मोदीजी ने शांत भाव से कहा कि आप लोगों का ध्यान कुछ ऐसी तरफ ले जाएं कि वे महंगाई की बात भूल कर उसमें लग जाएं। मंत्रियों को बात समझ नहीं आई। वे सभी लौट गए।

इस जानकारी को पहले मैंने हलके में लिया। फिर सरकार के क्रियाकलापों पर गौर करना शुरू किया। मंत्रियों की तरफ तो कुछ नजर नहीं आया, लेकिन ऐसा लगता है कि अब मोदीजी ने इस मोर्चे की कमान खुद संभाल ली है। अपनी उपस्थिति से हर मौके को वे एक ‘इवेंट’ में बदल देते हैं। इन सबके बीच मूल मुद्दे पर से ध्यान हट जाता है। आप सिलसिलेवार ढंग से भूटान से लेकर उनकी नेपाल, जापान की यात्रा या चीनी राष्ट्रपति के भारत दौरे तक को देखिए। हर बार असल मुद्दों से हट कर मीडिया उनके बयानों पर न्योछावर होने लगा। जापान के साथ परमाणु करार अभी तक नहीं होने से लेकर मोदीजी के जापान दौरे को जिस रूप में देखा जाए, वहां जैसे ही उन्होंने ढोल बजाया, मीडिया उनका दीवाना हो गया। इसके अलावा, कश्मीर में बाढ़ में फंसे लोगों तक ठीक से मदद भी नहीं पहुंची थी कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को मदद की बात ने लोगों का ध्यान दूसरी तरफ खींच लिया। कश्मीर के बाढ़ पीड़ित अब सुर्खियों में नहीं हैं। असम के बाढ़ पीड़ितों की पीड़ा सामने आई ही नहीं, क्योंकि मीडिया दूसरे आकर्षणों में फंसा है।

अपने अमेरिका के दौरे में नरेंद्र मोदी ने सब कुछ नए तेवर और कलेवर के साथ किया। यह दौरे की भव्यता का ही नतीजा है कि पुरानी सरकार की नीतियों को आगे बढ़ाने वाले उनके कई ऐलान को भी मीडिया ने ऐसे परोसा, मानो यह सब नई सरकार के सौ दिन का कमाल हो। अमेरिका दौरे से हासिल उपलब्धियों की विवेचना होती, इससे पहले ही मोदीजी ने दो अक्तूबर को ‘स्वच्छ भारत’ के अभियान का ऐलान कर दिया। हाथ में झाड़ू पकड़ने ने ऐसा रंग जमाया कि आम आदमी पार्टी की दिल्ली विधानसभा चुनाव में हुई जीत के जश्न में हाथ में लेकर लहराए गए तमाम झाड़ुओं की तस्वीर भी धुंधली पड़ गई। सब्जियों के दाम अब भी हमारी जेब काट रहे हैं। आलू-प्याज पैंतीस-चालीस रुपए किलो, दाल से लेकर खाने-पीने की दूसरी तमाम चीजों की कीमत अपनी पूरी तेजी में, रेल किराए में पहले चौदह फीसद बढ़ोतरी के बाद अब तत्काल टिकट के किराए में बढ़ोतरी। चुनावी वादों का क्या है!
अंत में कहना चाहता हूं कि मोदीजी, प्रधानमंत्री के तौर पर आप देश को जिस दिशा में, जिस गति से और जितनी भी ऊंचाई पर ले जाना चाहते हों, हम आपके साथ हैं। मैं तो बस इतना कह रहा हूं कि दरअसल महंगाई अब हमारे लिए मुद्दा नहीं, क्योंकि ‘पब्लिक का आकर्षण’ दूसरी तरफ ले जाने में आप कामयाब रहे हैं। उम्मीद है, आपके मंत्रियों को भी आपका यह मंत्र अब समझ में आ गया होगा!
http://www.jansatta.com/columns/mantra-to-deflect-attention/

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