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By  RAJKUMAR MEENA

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी ओर नरेंद्र मोदी की सरकार. क्या ये एक ही राह पर चल रहे हैं या इनकी राहें जुदा हैं?

नरेंद्र मोदी की सरकार का संघ से क्या रिश्ता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार और संघ के रिश्ते के बीच पार्टी की भूमिका ग़ायब हो चुकी है?

इन तीनों में सबसे ज़्यादा ताक़तवर होकर कौन उभरा है? आने वाले दिनों में तीनों के आपसी रिश्तों में कहीं उतार-चढ़ाव तो नहीं आएगा?

इन्हीं सवालों की पड़ताल कर रहे हैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर लगातार नज़र रखने वाले  Rajkumar Meena

संघ, भाजपा और सरकार पर ख़ास विश्लेषण

माधव सदाशिव गोलवलकर का ये सपना कि भारत में उनकी मंशा पूरी करने वाली सरकार हो, आख़िरकार कई दशकों के बाद पूरा हो गया.

गीता में कृष्ण ने कहा था, “जो भी अस्तित्वमान है, मैं सबमें हूँ और वे  सभी मुझमें हैं, लेकिन मैं उनमें नहीं हूँ और वे मुझमें नहीं है.”

भगवतगीता से भगवान कृष्ण के उपदेशों से प्रभावित होकर गोलवलकर ने संघ और उससे प्रेरणा लेने वाले संगठनों के आपसी संबंधों की ऐसी ही परिकल्पना की थी.

संघ के इस सबसे प्रभावशाली पुरोधा का ख़्याल था कि ये संगठन संघ से जुड़े रहेंगे, लेकिन आरएसएस के ध्येय और लक्ष्य उनसे ऊपर होंगे.

दूसरे शब्दों में कहें तो संघ के प्रति निष्ठा रखने वाले संगठनों और आरएसएस के बीच एक दूरी है, संघ एक ऊँचे पायदान पर है.

गोलवलकर का मानना था कि समाज के हर तबके को प्रभावित करने के लिए संघ को सत्ता की ज़रूरत होगी और ऐसा होने पर ही संघ का ‘मिशन’ पूरा हो पाएगा.

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी

ये मिशन सभी हिंदुओं को संगठित कर हिंदू राष्ट्र की स्थापना करना है. उन्होंने इसे ही ‘लक्ष्य प्राप्ति’ कहा था.

संघ का मिशन

‘लक्ष्य प्राप्ति’ को लेकर गोलवलकर के विचार भले ही पृष्ठभूमि में चले गए हों, लेकिन मोहन भागवत के आरएसएस और नरेंद्र मोदी की भाजपा ने संघ और उसके राजनीतिक अंग के बीच की दूरियों को प्रभावशाली तरीके से ख़त्म कर दिया है.

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही भाजपा है और भाजपा ही संघ है. ऐसा करने में वैराग्य और तप के आदर्श पर संघ को खड़ा करने का गोलवलकर का सपना पूरी तरह से भुला दिया गया.

शुद्धता, सदाचार, निरंतर प्रयास और सांस्कृतिक जागरूकता, अब शब्द भर रह गए हैं, जिनमें पहले जैसी कोई बात नहीं रही और अब इनका प्रयोग केवल भाषण देने के लिए ही किया जाता है.

गोलवलकर ने कभी राजनीति को एक संदिग्ध चरित्र वाली औरत कहा था, एक ऐसी औरत जिसके कई रंग हैं, जो एक तवायफ़ की तरह है और जो किसी को भी ख़ुश करने या ललचाने के लिए कोई भी भेष धर सकती है.

संघ को अब इस तरह के किसी राजनीतिक संसर्ग पर कोई आपत्ति नहीं रही.

गोलवलकर ये भी मानते थे कि संघ का ये पवित्र कर्तव्य है कि उसके पास समाज और राजनीति का ‘धर्मदंड’ या उस पर न्यायसंगत नियंत्रण हो, भले ही ये परोक्ष क्यों न हो.

उन्हें लगता था कि लोकतंत्र और सामाजिक विविधता के कारण ही उनके पास ये नियंत्रण नहीं है. इन्हीं बातों ने हिंदू एकता को नुकसान पहुंचाया है और समाज में ग़ैरहिंदू बातों और ताक़तों को आवाज़ दी है. मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी गोलवलकर की इस आस्था को भी तिलांजलि दे चुके हैं.

संघ और मोदी के समीकरण

न्यायसंगत नियंत्रण की जगह अब निर्लज्ज यथार्थवाद और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने ली है. धर्मदंड नहीं, बल्कि अब केवल दंड (डंडा) उनके पास रह गया है.

नरेंद्र मोदी और संघ के समीकरणों को समझने का मतलब उन बड़े परिवर्तनों को समझना है जिनसे संघ गुजरा है.

संघ गोलवलकर को अब एक भटकाव की तरह देखता है. एक नैतिकतावादी, निषेधकारी और नियंत्रणवादी संगठन से बदलकर संघ अब एक निर्दयी राजनीतिक संगठन बन गया है जिसे बालासाहब देवरस के राजनीतिक व्यवहारवाद पर अधिक भरोसा है.

देवरस ये मानते थे कि हिंदू राष्ट्र के लक्ष्य को पाने के लिए संघ को किसी आदर्श, विचार और नैतिकता के बंधनों से मुक्त होना पड़ेगा.

मोदी-भागवत की जोड़ी ने एक कदम और आगे बढ़कर देवरस के विचार को एक नया रूप दिया है.

यही वजह है कि मोदी केवल विकास और सशक्त राष्ट्रवाद की बात करते हैं और शिवराज सिंह चौहान स्कूलों में वंदे मातरम गवाकर विकास के एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं.

यहां तक कि थोड़े छिटके हुए से लग रहे येदियुरप्पा सिलेबस की किताबों में हिंदुत्व के एजेंडे के मुताबिक फेरबदल करते हैं.

नए तरह का हिंदुत्व

मोदी के नेतृत्व में संघ खुले तौर पर आगे की चीज़ें तय करता हुए दिख रहा है जो एक नए तरह का हिंदुत्व है.

दूसरे शब्दों में कहें तो संघ और भाजपा दोनों ने ही राजनीति और लोकतंत्र को लेकर अपनी-अपनी अवधारणा बदली है और ये बदलाव कॉरपोरेट जगत की पसंद के मुताबिक़ किया गया है.

बेलगाम स्वार्थों और कुशल प्रबंधन वाली सरकार के लिए विकास और प्रगति जैसे शब्द हिंदुत्व के कठोर एजेंडे को नर्म ज़ुबान में कहने की अदा है और भविष्य की महाशक्ति के तौर पर सशक्त भारत को लेकर होने वाली लफ़्फ़ाज़ी विकास के एजेंडे को वैध बनाते हैं.

कॉरपोरेट जगत के पास राजनीति को गिरवी रखने के लिए संघ और भाजपा के प्रचारतंत्र ने बड़ी ख़ूबी से नेताओं को दुश्मन करार दे दिया है और ख़ुद को भविष्य के भारत के प्रणेता के तौर पर भी पेश किया है, ये हमें किसी कंपनी के निदेशक मंडल की याद दिलाते हैं.

मोदी की छवि गढ़ता संघ

मोदी को एक न्यायप्रिय क्षत्रिय शासक के तौर पर पेश करने की कोशिश भी की जा रही है.

सरदार पटेल और इंदिरा गांधी सख़्ती और तत्काल फ़ैसला लेने के कारण प्रेरणास्रोत रहे हों, लेकिन कुल मिलाकर मोदी की एक ऐसे क्षत्रिय राजा जैसी तस्वीर उभारी जा रही है जो अपने साम्राज्य को अंदर-बाहर के शत्रुओं से बचाने के लिए युद्धरत है.

यह गोलवलकर के वैराग्य को ख़ारिज़ करने का नतीजा है. माधव सदाशिव गोलवलकर थोड़े समय के लिए संन्यासी रहे और उन पर स्वामी विवेकानंद का प्रभाव था.

गोलवलकर की छवि गढ़ने वाले प्रवक्ताओं ने उन्हें एक साहसी, कठोर, वीर, सदाचारी और रौबदार व्यक्ति के तौर पर पेश किया था. मोदी के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसा ही कर रहा है.

Link  http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/10/141009_rss_bjp_government_politics_pkhttp://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/10/141009_rss_bjp_government_politics_pk

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