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नई दिल्‍ली (8 फरवरी): 16 मई 2014 की चुभती हुई गर्मियां। अरविंद केजरीवाल नाम का नायक सड़क पर आ चुका था। आम आदमी पार्टी बर्बाद हो चुकी थी और राजनीति के विश्लेषक उनकी संभावनाओं से खारिज कर चुके थे। मऊ से मणिपुर तक लोकसभा की 434 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी ने जमानत ज़ब्ती का रिकॉर्ड बना डाला था। नरेंद्र मोदी के उदय ने केजरीवाल की किरणों को ढक लिया था।

लेकिन 9 महीने में ही केजरीवाल ने अपराजेय घोषित कर दिए गए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ऐसी कील ठोंक दी कि बीजेपी बिलबिला उठी। उसकी सारी सियासत धूल में मिल गई और सारे सिक्के खोटे साबित होने लगे। अरविंद केजरीवाल नाम की राजनैतिक कसीदाकारी ने बीजेपी के रफूगरों को एक रहस्यलोक का कैदी बनाकर छोड़ दिया था। सीमित संसाधन, सीमित जन शक्ति और सीमित धन शक्ति के साथ आगे बढ़ रहे केजरीवाल ने सधे हुए नट की तरह कबड्डी खेलती बीजेपी को तार पर खींच लिया था। प्रधानमंत्री और बीजेपी अध्यक्ष को न तो इसका अंदाजा था और न ही इसकी आदत।

महाराष्‍ट्र, हरियाणा और झारखंड में सरकार बना चुकी बीजेपी ने दिल्ली में एक अकेले केजरीवाल का सामना करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चमत्कार को इश्तेहार के खुले बाजार में उतार दिया था। दिल्ली मैदान के रामलीला मैदान में देश के प्रधानमंत्री का ये वो अभिमान था जिसमें लोकतांत्रिक गरिमा का घोर अभाव था। वो केजरीवाल का नाम भले नहीं ले रहे थे लेकिन इस नाम के आतंक ने उन्हें भीतर तक हिला दिया था।

चलो चलें मोदी के साथ के नारे पर न खुद नरेंद्र मोदी को भरोसा रह गया था और न उनकी बीजेपी को। इस भरोसे को बहाल करने के लिए अमित शाह ने नगर निगम जैसे एक चुनाव के प्रचार की कमान अपने हाथों में ले ली। दो सौ से ज्यादा सांसदों को 70 सीटों पर झोंक दिया गया और कैबिनेट मंत्री काम काज ठप करके प्रचार में कूद पड़े। कुछ भी करके बीजेपी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भीतर ये आत्मविश्वास नहीं भर पा रही थी कि उनके कदमों के नीचे की ज़मीन अभी खिसकी नहीं है। इसके बावजूद कि सारे हथकंडों को लोकप्रियता के हिंडोले में झूल रही पार्टी ने नैतिकता का अनुमति पत्र दे दिया।

देश दुनिया में डंका बजाकर दिल्ली लौटे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पहली बार एहसास हुआ कि उनके सामने भी एक दीवार खड़ी हो सकती है। एक ऐसी दीवार जिसे हर कीमत पर ध्वस्त करने के लिए वो छटपटा उठे। प्रधानमंत्री की तस्वीरों वाले भर-भर पन्ने के इश्तेहार लोकप्रियता की रद्दी में जा रहे थे। यह एक ऐसा डर था जिससे लड़ने की आदत बीजेपी को 16 मई 2014 के बाद छूट चुकी है। नतीजा नगर निगम जैसे चुनाव में प्रधानमंत्री को मोहल्ला सभाएं करनी पड़ रही थीं। केजरीवाल नाम की दीवार की ऊंचाई कम साबित करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में लोकसभा चुनाव से भी सघन प्रचार किया। इस टकराव ने दिल्ली के चुनाव को राष्ट्रीय बना दिया।

नरेंद्र मोदी को सीधे मुकाबले में चोट पहुंचा रहे अरविंद केजरीवाल ने दृश्य बदल दिया था। इस नए केजरीवाल के सामने वो महारथी नतमस्तक खड़े थे जिन्होंने अन्ना के अगस्त उपवास पर उनका उपहास उड़ाया था। जनलोकपाल के लिए उपवास पर बैठे अन्ना हजारे और उस आंदोलन के सूत्रधार अरविंद केजरीवाल को संसदीय लोकतंत्र के पुराने खिलाड़ियों ने एक खलनायक साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अब कोसने वाली उन कतारों के नेता इतने बेचारे हो चुके हैं कि उन्हें केजरीवाल नाम की दीवार में अपने पराजय के दर्द की दवा नज़र आ रही है।

26 नवंबर 2012 को बनी आम आदमी पार्टी को अरविंद केजरीवाल ने अकेले अपने दम पर सिर्फ दो साल में दिल्ली की राजनीति के केंद्र में खड़ा कर दिया है। एग्जिट पोल के नतीजों पर ऐतबार करें तो दिल्ली ने उम्मीदों के उस उन्माद पर फिर से अपनी अंगुली रखी है। तो क्या 28 दिसंबर 2013 का वो दृश्य दोहराए जाने की औपचारिक प्रतीक्षा में है? सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद जब बीजेपी ने दिल्ली को सरकार देने से मना कर दिया तो केजरीवाल ने सिर्फ 28 विधायकों के दम पर बदलाव का एक प्रयोग शुरू किया था। सस्ती बिजली, मुफ्त पानी, भ्रष्टाचार पर लगाम और जनता से सीधे संवाद के उस प्रयोग की 49 दिनों में ही अकाल मृत्यु हो गई। लोकसभा चुनाव के बाद जब केजरीवाल को इसका एहसास हुआ तो वो हिल चुके थे।

दिल्ली की राजनीति की घटनाएं तेजी से घटती हैं। बीजेपी जोड़तोड़ से सरकार बनाने की संभावनाएं टटोलती है। लोकप्रियता और बदनामियों की आशंका के बीच वो चुनाव से कतराती रहती है। कांग्रेस अपने आपको मैदान से बाहर मान लेती है और केजरीवाल एक कायांतरण के लिए तैयार होने लगते हैं। पहले लोकसभा, फिर हरियाणा, फिर महाराष्ट्र और फिर झारखंड के विजय अभियानों पर इठला रही बीजेपी केजरीवाल को काठ का घोड़ा समझे बैठी थी। लेकिन जब उन्होंने दौड़ना शुरू किया तो उसकी सारी कागजी तैयारियां कटी पतंग की तरह हवा में गुम होती चली गईं।

केजरीवाल ने चुनाव की कड़ियों को विजय में ऐसे बदला था कि बड़े-बड़े चेहरों से भरी हुई बीजेपी को अपने सबसे बड़े तारनहार के बचाव में उतरना पड़ा। शनिवार के दिन दिल्ली अपनी सियासत का नया अध्याय लिख रही थी। मतदान केंद्रों पर कतारें लगी हुई थीं। शाम ढली तो करोंड़ों के प्रचार और बदलाव के विचार के बीच देश की राजधानी फैसला कर चुकी थी। एक ऐसा फैसला जिसने सिर्फ 9 महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र के नाम के आगे लगा करिश्माई होने का ठप्पा पोंछ दिया।

5 अप्रैल 2012 के जंतर-मंतर के इसी अनशन ने रामलीला मैदान के अगस्त आंदोलन की आधारशिला लिखी थी। लेकिन तब बहुत कम लोग जानते थे कि रालेगण से दिल्ली के बीच बने इस पुल का निर्माता आईआईटी खड़गपुर का ये शर्मिला इंजीनियर है। आईआरएस की ऐशो आराम की नौकरी छोड़कर अरविंद केजरीवाल ने उम्मीदों की इंजीनियरिंग पर काम शुरू किया और उसकी प्रयोगशाला बना अन्ना हजारे का अगस्त अनशन। अन्ना हजारे ने इसके पहले भी तमाम अनशन किए थे। लेकिन उसे एक ऐसे जनज्वार में बदल देना कि संसद को सोचना पड़ जाए, अरविंद केजरीवाल की संगठन की वजह से संभव हुआ था।

गोविंद केजरीवाल और गीता देवा का ज़िद्दी बेटा तब खुद नहीं जानता था कि उसका रास्ता क्या है। लेकिन वो इतना जरूर जानता था कि उसे जाना कहां है। इसीलिए 26 नवंबर 2012 को जब अरविंद केजरीवाल ने अपने इरादों को आम आदमी पार्टी में बदला तो उन्हें जानने वाले बिल्कुल हैरान नहीं हुए। सिर्फ तीन साल में तीन भूमिकाएं बदल डालीं केजरीवाल ने। नौकरीपेशा से सामाजिक कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता से राजनैतिक नायक।

एशिया का नोबल कहे जाने वाले मैगसेसे पुरस्कार विजेता अरविंद केजरीवाल के लिए राजनीति का सफर न सुगम रहा है न सुरीला। जंतर मंतर से लेकर रेलभवन तक उन्होंने बहुत सोच समझकर अपनी छवि एक जुझारू नेता की गढ़ी। देखते ही देखते केजरीवाल भारतीय राजनीति का जरूरी हिस्सा बन गए। उनकी आलोचना हो सकती है, उनकी प्रशंसा भी हो सकती है लेकिन उन्हें दरकिनार नहीं किया जा सकता।

अरविंद जिद्दी हैं लेकिन अपनी गलतियों को गलती स्वीकार करने का साहस उन्हें दुर्लभ बनाता है। सरकार छोड़ने से लेकर बिना जमानत तिहाड़ जाने तक उन्होंने बार-बार ये साबित किया है कि वो आम आदमी हैं। सियासत में शून्य से शिखर की ओर ये ऐसी यात्रा थी जिसमें अरविंद केजरीवाल के परिवार के हिस्से में निजी आरोपों की यातनाएं आई हैं। अरविंद सरकार बना पाएं या नहीं, वो सरकार चला पाएं या नहीं, वो कुछ बदल पाएं या नहीं लेकिन यह सत्य अब एक तथ्य है कि बदलने का जुनून हो तो नायक पहले निकलता है कारवां बाद में बनता है।

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