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आम आदमी पार्टी के दिल्ली की सत्ता में वापस लौटने और अरविंद केजरीवाल के फिर से मुख्यमंत्री बनने के बाद ये सवाल फिर उठ रहा है कि क्या भारतीय राजनीति बदलेगी ? क्या भारतीय राजनीति से वंशवाद खत्म होगा ? क्या भारतीय राजनीति में हमारे और आपके जैसे आम मतदाता शामिल हो पाएगा ?

 
सवाल बहुत से हैं और जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है. लेकिन एक सवाल का जवाब है. आम आदमी पार्टी ने अब तक भारतीय राजनीति में क्या बदला ?

आपको पता है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनाव जीतने से पहले यूपी की जनता से क्या वादे किए थे ? समाजवादी पार्टी के घोषणापत्र में क्या था ? और अब तक उन वादों में से कितने पूरे हुए हैं ? अच्छा अगर आप यूपी से नहीं बिहार से हैं तो क्या आपको पता है कि बिहार की सत्ताधारी पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने बिहार की जनता से चुनाव के पहले क्या वादे किए थे ? और उनमें से अब तक कितने पूरे हुए हैं. हो सकता है ये पुरानी बातें हो. क्योंकि इन दोनों राज्यों में चुनाव हुए काफी समय बीत चुका है. लेकिन हाल ही में झारखंड, महाराष्ट्र, हरियाणा में चुनाव हुए हैं. तीनों ही राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है. क्या आपको याद है कि रघुवर दास, देवेंद्र फडणवीस और मनोहर लाल खट्टर ने चुनाव से पहले अपने राज्य की जनता से क्या वादे किए थे ? और अब तक उनमें से कितने पूरे हुए हैं ?

मुझे नहीं लगता कि आपको याद भी होगा. लेकिन दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने क्या वादे किए हैं. ये आपको जरूर याद होगा. भले ही 70 वादे ना याद हो. लेकिन मुफ्त वाई फाई, मुफ्त पानी और बिजली के दाम करने जैसे वादे जरूर याद होंगे. और सिर्फ दिल्ली ही नहीं पूरा देश ये जानना चाहता है कि आम आदमी पार्टी अपने वादे कब तक और कैसे पूरा करेगी ?

अब आपको समझ में आया आम आदमी पार्टी ने देश की राजनीति में क्या बदला है ? आम आदमी पार्टी ने हमें और आपको अपनी सरकारों से सवाल पूछना सिखाया है. आज तक हुए सभी चुनावों में राजनीतिक पार्टियां घोषणाएं तो कर देती हैं लेकिन सरकार बनने के बाद उन्हें भूला दिया जाता है. आम आदमी पार्टी अपने वादे पूरे कर पाएगी या नहीं ये अलग विषय है लेकिन आज सभी उन वादों के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं. मैं भारतीय राजनीति में आम आदमी पार्टी की ये बड़ी देन मानता हूं कि हम और आप अब अपनी सरकारों से सवाल पूछ रहे हैं. उनके किए वादों के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं.

 
अगर आप किसी राजनीतिक पार्टी से नहीं हैं तो जहां तक मैं सही हूं आपने किसी राजनीतिक दल का प्रचार नहीं किया होगा. वो भी खास तौर पर तब जब आप नौकरी करते हों. शहरों की भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान खुद को समय नहीं दे पाता है. फिर किसी राजनीतिक पार्टी का प्रचार करना तो बहुत दूर की बात है.

आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी का प्रचार करने के लिए पूरे देश से हजारों युवा आए. ये वो युवा हैं जो देश की बड़ी – बड़ी कंपनियों में नौकरी करते हैं. जिनका एक-एक मिनट बहुत कीमती होता है. इन लोगों ने आम आदमी पार्टी के लिए जमकर प्रचार किया. क्योंकि इन्हें अरविंद केजरीवाल पर भरोसा था कि वो भारतीय राजनीति की दिशा बदलेंगे.

मैं जिनकी बात कर रहा हूं ये वो लोग नहीं है जिन्हें राजनीति में बहुत रुचि है. या फिर उनका किसी राजनीतिक पार्टी की तरफ झुकाव है. ये वो लोग हैं जिन्होंने बस इस उम्मीद से आम आदमी पार्टी का साथ दिया कि भारतीय राजनीति में कुछ बदलेगा. कुछ अच्छा होगा. आम आदमी पार्टी ने भले ही देश के सभी युवाओं की सोच ना बदली हो. लेकिन युवाओं को राजनीति की तरफ लाना जरूर शुरू कर दिया है. जिसे मैं एक बड़ी उपलब्धि मानता हूं.

 
चुनाव से पहले राजनीतिक पार्टियां जमकर पैसे खर्च करती हैं. चुनाव आयोग के दिशा निर्देशों को ताक पर रखकर राजनीतिक पार्टियां करोड़ों रुपये चुनाव में खर्च करती हैं. और जाहिर सी बात है इसके लिए वो देश के बड़े – बड़े उद्योगपतियों से पैसा लेती हैं. जिन्हें चुनाव के बाद अनैतिक रूप से फायदा भी पहुंचाती हैं. लेकिन आम आदमी पार्टी ने चुनाव लड़ने के लिए आम जनता से पैसा लेना शुरू किया. आम आदमी पार्टी ने जनता को ये अहसास दिलाया कि हम नहीं आप चुनाव लड़ रहे हैं. हो सकता है आम आदमी पार्टी ने देश के उद्योगपतियों से भी पैसा लिया हो. लेकिन आम आदमी पार्टी ने इसमें जनता को भी शामिल किया. हालांकि आम आदमी पार्टी पर गलत तरीके से चंदे लेने के भी आरोप भी लगे. हो सकता हैं ये सही भी हो. लेकिन फिर भी उन्होंने अपनी वेबसाइट पर चंदे की पूरी डिटेल देकर उसमें पार्दर्शिता लाने की कोशिश की.

बीजेपी, कांग्रेस, एसपी, जेडीयू, बीएसपी को किसने और कितना चंदा दिया ये आप कभी नहीं जान पाएंगे. लेकिन आम आदमी पार्टी को किसने और कितना पैसा दिया आप उनकी वेबसाइट पर जाकर देख सकते हैं. मुझे लगता है कि ये भारतीय राजनीति में बड़ा बदलाव है. एक राजनीतिक पार्टी ने ये सिद्ध कर दिया जनता के पैसे से भी चुनाव लड़ा जा सकता है और जीता भी जा सकता है.

लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को करीब 31 फीसदी वोट मिले थे. मेरी उम्र ज्यादा नहीं है इसलिए शायद मेरे ख्याल में कोई ऐसी पार्टी नहीं है जिसे विधानसभा या लोकसभा चुनाव में हाल फिलहाल कुल पड़े वोटों का 50 प्रतिशत से भी ज्यादा मिला हो. लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को 54.3 प्रतिशत वोट मिले. जबकि बीजेपी को 32.2 फीसदी, कांग्रेस को 9.7 फीसदी और बीएसपी को 1.3 फीसदी ही वोट मिले. यानी की दिल्ली के हर दूसरे वोटर ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया. यानी की समाज के हर वर्ग ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया. हिंदू, मुस्लिम और सिख ने आम आदमी पार्टी का साथ दिया.

 
सीएसडीएस के आंकड़े के अनुसार दिल्ली के 12 प्रतिशत मुस्लिमों में से करीब 77 फीसदी ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया. जबकि दिल्ली की 4 फीसदी वाली सिख आबादी में से करीब 57 फीसदी ने आम आदमी पार्टी का साथ दिया. आम आदमी पार्टी ने बीएसपी के वोटरों में भी सेंध मारी. पिछली बार बीएसपी को करीब 7 फीसदी के आसपास वोट मिला था जबकि इस बार सिर्फ 1 फीसदी ही रह गया है. यानी की मुस्लिम, दलित, सिख सबने आप का साथ दिया है.

यानी की धर्म और जाति के नाम पर भारत में वोटों का जो ध्रुवीकरण आज तक होता रहा है उस पर आम आदमी पार्टी ने करारा प्रहार किया है. आम आदमी पार्टी ने समाज के सभी वर्गों तक अपनी पहुंच बनाई और लोगों का विश्वास जीता. जिससे बीजेपी, कांग्रेस और एसपी जैसे राजनीतिक दल सीख सकते हैं. जिनकी राजनीति ही धर्म और जाति पर टिकी हुई है.

 
ऐसी बहुत सी छोटी-छोटी चीजें हैं जो आम आदमी पार्टी ने बदली हैं. लेकिन अपनी कोशिशों में आम आदमी पार्टी कितना कामयाब हो पाएगी या फिर देश की बाकी पार्टियों जैसी ही हो जाएगी, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा. लेकिन इतना है कि आम आदमी पार्टी ने देश की राजनीति को एक नई दिशा दी है. और अन्य राजनीतिक दलों को इससे सिखना चाहिए.

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